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गरीबी को मात देकर, यूँ आगे बढ़ी सामाजिक कार्यकर्ता फूलबासन बाई यादव

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गरीबी को मात देकर, यूँ आगे बढ़ी सामाजिक कार्यकर्ता फूलबासन बाई यादव

संसार में जिन लोगों ने बड़े काम किए, उनके हौसले भी बहुत बड़े थे। विपरीत परिस्थितियों के मध्य भी वे डटे रहे और हिम्मत से उसे पार कर आगे बढ़े। हौसले से भरी, ऐसी ही एक महिला की जीवन यात्रा आज आपके सामने है। पद्मश्री से सम्मानित छत्तीसगढ़ की फूलबासन बाई यादव, आज तमाम महिलाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं। भीषण गरीबी का सामना करने वाली फूलबासन, आज सैकड़ों महिलाओं को रोजगार दे रही हैं। महिला दल गठित कर नशा मुक्ति अभियान भी चला रही हैं। आइये जानते है कि, कैसे एक महिला ने अपनी हिम्मत और मेहनत के बल पर यह सफर तय किया।

भीषण गरीबी में गुजारा बचपन, आगे बढ़ने की ऐसे मिली प्रेरणा

फूलबासन बाई यादव मूलतः छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के एक गांव की निवासी हैं। उनका बचपन भीषण गरीबी में गुजरा। महज पांचवीं कक्षा तक पढ़ी फूलबासन का छोटी ही उम्र में विवाह हो गया था। शादी तो हो गई, पर गरीबी ने पीछा नहीं छोड़ा। खाने को पैसे नहीं थे। घर में अनाज का एक दाना नहीं होता था। फूलबासन बाई के बच्चे भूख से बिलखते हुए, दूसरे घर अनाज मांगने जाते, तो उन्हें दुत्कार कर भगा दिया जाता। यह सब देखकर एक बार फुलबासन ने सोचा कि, मैं अपनी जिंदगी खत्म कर लूं, लेकिन उनकी बेटी ने हाथ थाम लिया। फूलबासन की जिंदगी ने यहीं से दूसरा मोड़ ले लिया। फुलबासन कहती हैं, ” बच्चों का भूख स तड़पना, देखा नहीं जा रहा था। सोचा कि बच्चों समेत मर जाऊंगी,मगर मेरी दोनों बेटियों ने रोक लिया। तभी लगा कि मेरे जैसे कितनी बेबस माताएं होंगी, अगर सब संगठित हो जाएं, तो कोई बच्चा भूखा नहीं सोएगा। उसी समय तय कर लिया कि अब अपने और इस गांव के किसी बच्चे को भूखा नहीं रहने दूंगी।” फूलबासन बाई के इसी संकल्प से महिला स्वयं सहायता समूह का गठन हुआ।

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वर्ष 2001 में महिलाओं को किया संगठित, पहले-पहल हुआ विरोध

फुलबासन बाई यादव ने वर्ष 2001 में महिलाओं को संगठित किया। दो रुपए और दो मुट्ठी चावल से, इस स्वयं सहायता समूह की शुरुआत हुई। महिलाओं के इस स्वयं सहायता समूह का पहले-पहल बहुत विरोध हुआ। पुरुषप्रधान समाज में महिलाओं का, इस तरह से बाहर निकल कर काम करना आसान नहीं था। ग्रामीणों ने फूलबासन और उनकी महिला सदस्यों को भला-बुरा कहा। यहां तक कि गांव से निष्काषित करने की चेतावनी तक दे डाली। लेकिन फूलबासन बाई के हौसले भी कहां डिगने वाले थे। उन्होंने महिला सदस्यों के साथ मिलकर गांव की तस्वीर ही बदल दी। गांव स्वच्छ दिखने लगा। शिक्षा का स्तर अच्छा हो गया। स्वास्थ्य शिविर लगने लगे। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए बकरी पालन से लेकर दुकान खोलने तक के लिए, कर्ज दिया गया और स्वरोजगार से महिलाओं को जोड़ा गया। फूलबासन बाई यादव, स्वयं बकरी पालन से आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनी। गांव में हुए परिवर्तन को देखकर ग्रामीण भी आश्चर्यचकित हो गए और महिला सदस्यों को लेकर उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन आया।

दो लाख महिलाओं तक पहुंची फूलबासन बाई यादव

फूलबासन बाई का एक गांव से शुरू किया गया प्रकल्प, अब छत्तीसगढ़ के 1600 गांवों तक पहुंच चुका है। दो लाख महिलाएं इन स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं। आत्मनिर्भर हुई हैं। महिलाओं का यह समूह, फूलबासन बाई के नेतृत्व में समाज जीवन के विविध क्षेत्रों को बेहतर बनाने और कुरीतियों को दूर करने के लिए कार्य करता है। नशामुक्ति, स्वच्छता, आत्मनिर्भरता, पर्यावरण, कुपोषण मुक्ति जैसे क्षेत्रों में, यह महिला समूह तत्परता से संलग्न है। फूलबासन बाई यादव कहती हैं, ” नशा हमारे समाज के लिए दानव की तरह है। यह घर-परिवार और समूचे देश को नष्ट कर सकता है। हमारी महिलाएं संगठित होकर नशामुक्ति के विरुद्ध अभियान चला रही हैं।” फूलबासन बाई यादव ने महिला फौज भी गठित की है। गुलाबी साड़ी पहनी यह इस समूह की महिलाएं, हाथ में लाठी लेकर गांव की सुरक्षा करती हैं। घरेलू हिंसा, प्रताड़ना जैसे मामले न हों यह सुनिश्चित करने के लिए ही, महिलाओं की यह फौज तैयार की गई है।

पद्मश्री से हुई सम्मानित, मिले कई प्रतिष्ठित पुरस्कार

फूलबासन बाई का हौसला हर किसी के लिए गौरव और प्रेरणा का विषय है। एक महिला जो कभी अन्न के एक-एक दाने को मोहताज थी, आज लाखों महिलाओं को आर्थिक रुप से सशक्त बना रही है। फुलबासन बाई यादव के इन्हीं प्रयासों को देखते हुए, वर्ष 2012 में उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया। वे नारी शक्ति सम्मान से भी सम्मानित हुईं। छत्तीसगढ़ सरकार ने जननी सुरक्षा योजना नामक प्रसूति कार्यक्रम के लिए, उन्हें अपना ब्रांड एंबेसडर भी घोषित किया था। वर्ष 2014 में महावीर फाउंडेशन पुरस्कार से भी वे सम्मानित हुईं। उन्हें एक चैनल के प्रतिष्ठित शो में भी आमंत्रित किया गया, जहां उन्होंने अभिनेता अमिताभ बच्चन के साथ अपनी जीवन यात्रा और संघर्ष गाथा साझा की।

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