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हिमाचल: उपचुनाव ने डेढ़ साल पहले ही चिंता में डुबोईं पार्टियां

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हिमाचल: उपचुनाव ने डेढ़ साल पहले ही चिंता में डुबोईं पार्टियां

हिमाचल प्रदेश में आम चुनाव को अभी डेढ़ साल बाकी है,लेकिन एक के बाद एक तीन विधायकों की मृत्यु और मंडी के सांसद रामस्वरूप कीआत्महत्या ने प्रदेश के दोनों प्रमुख दलों को अभी से चुनावी चिंता में डाल दिया है। आलम यह है कि बीजेपी के सत्ता बरकरार रखने और कांग्रेस के सत्ता वापसी के दावों का दम इन्हीं उप चुनावों में सामने आ जायेगा। जाहिर है जो हारा उसके खिलाफ हल्ला शुरू हो जायेगा। यही कारण है कि दोनों पार्टियों का शीर्ष नेतृत्व गंभीर मंथन से गुज़र रहा है। लेकिन उनकी धुकधुकी अब टिकटों के दावेदारों ने बढ़ानी शुरू कर दी है। इस समय हिमाचल में चार उप चुनाव तय हैं। फतेहपुर, जुब्बल कोटखाई,अर्की विधानसभा के और मंडी लोकसभा के ।


फतेहपुर सीट कांग्रेस के पास थी लेकिन विधायक सुजान सिंह पठानिया का लम्बी बीमारी के बाद निधन हो गया।कांग्रेस वहाँ से उनके बेटे भवानी सिंह को उतारना चाहती है लेकिन यह उतना आसान नहीं है। क्योंकि पिछली बार जब सुजान सिंह पठानिया ने अपनी बीमारी का हवाला देते हुए टिकट किसी और को देने की बात कही थी तो सेकंड लाइन से तीन चार लोग आगे आये थे। हालाँकि वीरभद्र सिंह नहीं माने थे और पठानिया ही लड़े और जीते थे। यह दीगर बात है कि कांग्रेस यहां दावेदारों को सुहानुभूति लहर के कोण से शांत कर ले। लेकिन बीजेपी के हालात कांग्रेस से ज्यादा तल्ख़ हैं। किरपाल परमार को बीजेपी ने 2017 में टिकट दिया था। मोदी ने अपने दौरे की पहली रैली उनके लिए की थी लेकिन पूर्व में टिकट पाते रहे प्रत्याशी बलदेव ठाकुर आज़ाद चुनाव लड़े और किरपाल हार गए। अबके फिर वही स्थितियां है। कोई मैदान छोड़ने को तैयार नहीं दिखता , उलटे नए सियासी समीकरणों के तहत दो तीन दावेदार बढ़ गए हैं। फ्रंट रनर किरपाल ही हैं लेकिन अगर बगावत रही तो–?? यह सवाल बीजेपी को खाये जा रहा है।

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बीजेपी के मुख्य सचेतक नरेंद्र बरागटा के निधन कोटखाई की सीट खाली हुई है। यहाँ माना जा रहा है कि बरागटा के बेटे को ही टिकट दिया जायेगा ,लेकिन यह जीत की गारंटी नहीं है। कुछ और लोग कतार में हैं और उन्होंने घुड़कियाँ देनी शुरू कर दी हैं। इसमें एक महिला नेत्री भी हैं। कुछ भितरघात भी दिख रहा है। ऊपर से सबसे बड़ी चिंता कोटखाई के वोटर की है जो सत्ता के हिसाब से वोट करता रहा है। मसलन पिछली बार माहौल कांग्रेस के खिलाफ था तो लोगों ने बरागटा को जितवाया ताकि वे मंत्री बनकर इलाके में काम करें। यह अलग बात है कि धूमल के हारने के बाद जयराम ने उन्हें मंत्री नहीं बनाया। अब उपचुनाव आया तो उनका ध्यान यहां जरूर गया है लेकिन अगर लोगों ने क्या सोच रखा है यह सबकी चिंता है । क्या लोग रोहित ठाकुर , जिन्हें कांग्रेस की टिकट तय है ,को हराएंगे ? क्योंकि उस स्थिति में अगली बार आम चुनाव में उनको टिकट के लाले पड़ सकते हैं और ऐसे में जुब्बल कोटखाई का एक सेट लीडर ख़त्म हो जायेगा। खासकर पोस्ट वीरभद्र काल में। इसलिए वहाँ मामला यहीं अटका है कि लोग नया लीडर पैदा करते हैं या पुराने को सहेजने का काम करते हैं।


विधानसभा का तीसरा उपचुनाव अर्की में होना है जो दिग्गज नेता वीरभद्र सिंह के देहावसान से रिक्त हुई है। यहां कांग्रेस के कोई बड़े नाम सामने नहीं हैं क्योंकि वीरभद्र के यहां आने के बाद बाकियों का चैप्टर क्लोज हो गया था। अब वो रीओपन होगा लेकिन वीरभद्र सिंह की सुहानुभूति भरपूर रहेगी कांग्रेस के पास। जबकि वीरभद्र से पिछले चुनाव में हारे राम रत्न पाल के खिलाफ उन्हीं गोबिंद शर्मा ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया है जिनको काट कर पाल टिकट ले उड़े थे। गोबिंद तब सीटिंग विधायक थे। अब उन्होने बाकी दावेदार भी अपने पक्ष में करके मोर्चा खोल दिया है। उनकी एक ही बैठक के बाद प्रभारी अविनाश राय खन्ना को अर्की की गलियां नापनी पड़ गयीं। साफ़ जाहिर है कि चुनाव से पहले टिकट का चयन ही पसीने छुड़वा देगा।

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साभार: संजीव शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

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