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डॉ. वाई.एस. परमार, वो शख्स जिनकी बदौलत हिमाचल अस्तित्व में आया

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डॉ. वाई.एस. परमार, वो शख्स जिनकी बदौलत हिमाचल अस्तित्व में आया

हिमाचल प्रदेश के निर्माता एवं प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार एक निःस्वार्थ, प्रेरणादायक और बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। डॉ. परमार को प्रदेश के निर्माण, इसे उचित आकार व स्थान दिलाने के लिए सदैव याद रखा जाएगा। वाई.एस. परमार का सपना था कि पहाड़ी लोगों की एक अलग पहचान हो। डॉ. परमार की प्रतिबद्धता और समर्पण के फलस्वरूप ही हिमाचल को अनेक कठिनाइयों के बावजूद एक अलग पहचान मिली। डॉ. परमार की स्पष्टता, दूरदर्शिता और सशक्त प्रयासों के कारण ही वर्ष 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा प्राप्त हुआ।

परमार पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें स्वयं को पहाड़ी कहलाने में गर्व महसूस होता था और इसके पश्चात ही हिमाचली लोगों ने हर प्रकार की हिचकिचाहट को त्याग कर स्वयं का इस मिटटी से सम्बन्ध होने में गर्व महसूस करना आरम्भ किया। परमार पहाड़ी संस्कृति के प्रशंसक थे। वह पहाड़ी वेश-भूषा धारण करते थे और पहाड़ी वास्तुकला का प्रचार करते थे। डॉ. परमार सही मायने में राज्य की समृद्ध संस्कृति के सच्चे प्रचारक थे।

डॉ. वाई.एस. परमार का राज्य के विकास, विशेषकर सड़कों के निर्माण, बागवानी तथा कृषि क्षेत्र में अहम योगदान रहा है। डॉ. परमार की दूरदर्शिता और सशक्त नेतृत्व के कारण ही हिमाचल प्रदेश आज पहाड़ी क्षेत्रों के विकास के लिए देश में आदर्श राज्य बनकर उभरा है। परमार ने विकास के मुद्दों और योजना के सम्बन्ध में पहाड़ी क्षेत्रों को भारत के अन्य क्षेत्रों के अनुरूप आंकने के विरुद्ध आवाज उठाई और केन्द्र सरकार को केवल मैदानी क्षेत्रों के विकास के दृष्टिगत योजनाएं न बनाकर पहाड़ी राज्यों को भी प्राथमिकता देने के लिए राजी किया।

डॉ. वाई.एस. परमार का प्रदेश को विशेष पहचान दिलाने और राज्य के विकास का रोड मैप तैयार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान है। परमार आम आदमी के नेता थे और हमेशा उनके कल्याण और विकास के लिए संघर्षरत रहे। राज्य में सेब की बागवानी को प्रोत्साहित करने के लिए डॉ. परमार के योगदान का योगदान सराहनीय है, जिससे लोगों की आर्थिकी में बदलाव आया है।

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